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अदभुत आस्था

जय राम , जय राम ,जय श्री राम  (एक शाम राम मंदिर और सरयू तट पर।) अयोध्या मेरी मातृभूमि है ,मेरे माता-पिता की जन्म भूमि, मेरी ससुराल,मेरे बड़े भाई की ससुराल और उसके साथ ही साथ मेरे पूरे परिवार की जड़ों को समेटने वाली भूमि है अयोध्या । बचपन से ही इससे नाता रहा है और हो भी क्यों न ! हर वर्ष गर्मी की छुट्टियों में हम लोग यहीं आते थे घूमने के लिए और तब से कान में बराबर राम जन्मभूमि और उससे संबंधित विवाद (जो राजनीतिक भाषा में विवाद थे लेकिन  अयोध्या में रहने वाले लोगों के लिए पीड़ा उत्पन्न करने वाली स्थिति ) कानों में पड़ते थे । "भगवान  राम के सर पर छत नहीं है" यह सब बातें मैं सुनती थी और मन में गुनती थी । कालांतर में बाबरी मस्जिद टूटी , घटनाक्रम बना ,मुकदमा जीते। जिस दिन मुकदमा जीते उस दिन अनायास आंखों से आंसुओं की बारिश होने लगी थी।  फिर एक दिन शिलान्यास हुआ । रामलला की मूर्ति प्रतिष्ठित हुई और सदियों के बाद वह क्षण उपस्थित हुआ जो हर सनातन धर्मी के दिल की गहराइयों में बस गया । भव्य राम मंदिर का निर्माण!  जब से राम मंदिर का निर्माण हुआ तब से बराबर कई बार देखने का कार्...

लड़कियां गणित नहीं पढ़ती हैं::::::::?

लड़कियां गणित नहीं पढ़ती हैं।            (संस्मरण) आज दोपहर में मन बहुत भावुक हो गया ।हम सब लोग अपनी क्लासेस से फ्री होकर बैठे बात कर रहे थे तो अपने अपने बचपन के उन क्षणों  पर भी चर्चा कर रहे थे जिन्होंने हमारे मन  को बहुत प्रभावित किया । हम तीन लोगों ने तीन तरह की बातें कहीं। वो मैं आपसे भी शेयर करना चाहूंगी। हमारे साथ के दो बेहद कुशाग्र बुद्धि के साइंस टीचर्स अपने-अपने अनुभव साझा कर रहे थे  एक ने कहा कि जब वह ग्यारहनवीं  क्लास में आए तो उन्होंने बायोलोजी पढ़ने की इच्छा जाहिर की। साधारण पृष्ठभूमि के होने के कारण बहुत अधिक सपोर्ट नहीं था। जब पहले दिन वह क्लास में गए तो उनके शिक्षक ने उनसे पूछा "तुम्हारे पिता तुम्हें डॉक्टरी पढ़ा पाएंगे ? " इस बात ने उनका मनोबल इतना तोड़ दिया कि अगले दिन से वह दूसरी क्लास में बैठने लग गए और साइंस की दूसरी शाखा से उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की । मुझे नहीं लगता कि एक शिक्षक को इस तरह की बात किसी बच्चे से कहनी चाहिए थी। यह एक ऐसी बात थी जिसने उनके मन को बहुत अधिक प्रभावित किया था और उन्होंने बायोलॉजी ही छोड़ द...

विज्ञापन की कुरूप दुनिया और हम

नए प्रश्न  बीते कुछ दिनों से पुरुषों को कोसने की एक प्रथा सी चल पड़ी है। फेसबुक औऱ इंस्ट्राग्राम पर न जाने कितने किस्से और कहानियों की बाढ़ आई हुई है,जिनमें पुरुषों द्वारा महिलाओं पर होने वाले शोषण के किस्से बाकायदा नमक मिर्च लगाकर सुनाए और लिखे जाते हैं।यह सच है कि आज महिलाओं पर अत्याचार बहुत अधिक बढ़ गया है,साथ ही उसका रूप भी बहुत विकृत हो गया है,लेकिन बीते दिनों घटित हुई कुछ घटनाओं ने ,मेरे मन को झकझोर कर रख दिया,मेरा अन्तस् हिल उठा। "पुरुष जानवर है" "पुरुष भेड़िया है" यह कहने वाली महिलाओं के सामने ही मैं कुछ प्रश्न उठाना चाहती हूं,जिनका उत्तर शायद उनके पास भी नही है। महिलाएं कृपया मुझसे नाराज न हों।यह,,लेख मैं मात्र समाधान की चाह में लिख रही हूँ। एक घटना की कड़ियाँ देती हूं-------------- घटना 1 लखनऊ शहर के एक प्रतिष्ठित मार्किट के बाहर एक खूबसूरत सा बुटीक है,उसके बाहर की ओर एक मॉडल की कुछ आदमकद तस्वीरें लगी हैं,,,,,जिनमे वह अंतर्वस्त्रों का विज्ञापन कर रही है। सीढ़ियों पर एक चौदह पन्द्रह वर्ष की बच्ची खड़ी है,जिसका चेहरा कुछ कुछ लज्जा और अपमान से लाल था,,नजरें नीची थीं...

प्यार को प्यार ही रहने दो

"दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन ". वैलेंटाइन डे यानी स्नेह दिवस ,मन में मस्ती और मदहोशी छा जाने का दिन ।फरवरी शुरू होते ही मानो माहौल आशिकाना होना शुरू हो जाता है ।  दो दिन पहले छत पर बैठी हुई मैं, धूप का जबरदस्ती आनंद लेने का प्रयास कर रही थी( धूप अब मटर की फलियों  की तरह कड़ी हो गई है)तो अचानक से अपने जमाने का वैलेंटाइन डे याद आया, क्योंकि जब से टीचर बनी हूं, तब से वैलेंटाइन सप्ताह शुरू होते ही हमारे एंटीने, और रडार तेज होने शुरू हो जाते हैं, क्योंकि हमारे बच्चे हाई स्कूल और इंटरमीडिएट के हैं ,यानी कि प्रभावित होने वाली सर्वाधिक महत्वपूर्ण आयु में हैं और यह अनुशासन आवश्यक भी है क्योंकि वैलेंटाइन डे सिर्फ एक दिन  या एक सप्ताह का होता है, लेकिन जीवन और करियर हमेशा रहता है।  इतने वर्षों से तो वैलेंटाइन डे का यही रूटीन रहा है, कि स्कूल में बच्चों पर नजर रखनी है ,उनकी काउंसलिंग करनी है और इसी तनाव में खुद का वैलेंटाइन डे  इतने वर्षों  से, शाम को गुलाब की जगह गोभी के फूल के कोफ्ते पर आकर समाप्त होता है ।              ...

नीलकंठ से मेरे राम

नीलकंठ से मेरे राम भगवान राम का चरित्र अपने आप में बहुत ही विशाल है ।यह अनेक अंतरकथाएं एवं अंतर्निहित अभिलाषाएं अपने में समेटे हुए है यदि हम रामायण से लेकर रामचरितमानस तक सभी राम केंद्रित महाकाव्यों का अध्ययन करें तो एक बात स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आती है कि प्रभु राम ने अपने चरित्र से न केवल संपूर्ण विश्व को प्रेरित एवं जागरूक किया है बल्कि अनेक कष्ट और पीड़ाएं सही हैं।  यदि बहुत गहराई से देखें तो हमें यह भी ज्ञात होता है अपने अवतारी रूप में  ईश्वरीय शक्तियों से युक्त होते हुए भी भगवान राम ने हमेशा अनेक प्रकार की पीड़ाएं सही हैं और एक सामान्य मानव के समान ही जीवन के सुख और दुख का अनुभव किया है।  पुराणों में निहित है कि जब भी कभी कोई महाशक्ति अवतार लेती है तो वह अपनी  दिव्य शक्तियों का प्रयोग तब तक नहीं कर सकती है जब तक इसका प्रयोग करना विश्व के संरक्षण एवं विश्व के कल्याण के लिए आवश्यक न हो इसलिए चाहे लक्ष्मण को शक्ति लगने का प्रसंग हो ,चाहे सीता हरण का प्रसंग हो, या राम के जीवन में आने वाली अनेक अन्य बाधाएं  और तकलीफें प्रभु राम ने कभी भी अपनी दिव्य शक्तियों...

इसलिए औरतों का कमाना जरूरी है:::::

इसलिए औरतों का कमाना जरूरी है:::::: मित्रों ! यह सच है कि  अध्ययन का लक्ष्य  नौकरी करना मात्र नहीं होता है ।शिक्षा अनंत है ,शिक्षा का उद्देश्य अनंत है लेकिन बीते दिनों की एक घटना ने मुझे अंदर तक झकझोर  दिया ।खुद पर गर्व और संतोष भी अनुभव हुआ कि मैं वर्किंग हूँ और यह मानने के लिए मन बाध्य  हो गया कि महिलाओं की शिक्षा का संबंध उनके अपने धनोपाजर्न से भी जुड़ा हुआ है और उनका नौकरी करना भी आवश्यक है । मुझे याद आता है अपना समय ।मेरी मां प्रारंभ से ही एक गृहणी रही हैं। मेरी दोनों भाभियां भी वर्किंग नहीं हैं ।मेरे बहुत अच्छे और ऊंचे पदों पर आसीन मित्रों की पत्नियां भी वर्किंग नहीं हैं  लेकिन मैंने इन सभी महिलाओं को अपने हिसाब से खर्च करते देखा है ,अपने हिसाब से घर चलाते देखा है और पूरे स्वाभिमान और सम्मान के साथ अपनी जिंदगी बिताते हुए देखा है इसलिए एक ही नियम सभी पर लागू नहीं हो सकता है। आज भी बहुत सी महिलाएं बिना वर्किंग हुए या बिना कमाए हुए ही अपना जीवन स्वाभिमान के साथ जी रही हैं लेकिन अगर समाज में एक प्रतिशत घटना भी इस तरह की घटती है तो हम सोचने  पर अवश्य मजबूर...

सोशल मीडिया में फैलता ज़हर

सुनने में  बड़ा अजीब सा लगता है लेकिन सोशल मीडिया आज जहर फैलाने का माध्यम बन गया है। वह जहर जो हमारी जड़ों को खोखला कर रहा है और उन्हें विषाक्त बना रहा है। इसे रोका जाना बहुत आवश्यक है अन्यथा हमारी आगामी पीढ़ी  पूरी तरह से दूषित मानसिकता में जीने के लिए विवश हो जाएगी  क्योंकि उनके पास कोई भी आदर्श नहीं शेष रह जाएंगे।  कुछ  गिने-चुने तथाकथित प्रगतिशील  युवा  भारतीय संस्कृति को दूषित करने का काम कर रहे हैं। वे समाज को न जाने किस दिशा में ले जा रहे हैं। एक ऐसी दिशा जो अंतहीन है, जिसका कोई लक्ष्य नहीं है और जो  स्वयं विनाशगामी है। वह  भारत जिसे विश्व गुरु कहा गया है  जिसे सभ्यता और ज्ञान का प्रतीक माना गया है वह  अपनी संस्कृति को धीरे-धीरे कहीं खो न दे ।इस पर चिंतन करना बेहद आवश्यक है विषय चाहे जितनी बार  कहा  और सुना जा चुका हो लेकिन आज इस पर विचार करना बहुत आवश्यक है । जितना अधिक इस पर लिखा जाएगा जितनी अधिक इस पर  बात करेंगे उतना ही अधिक लोग जागरूक होंगे इसलिए हमारा और आपका कर्तव्य है कि इस विषय में जितना अधिक लोगों को ...