विज्ञापन की कुरूप दुनिया और हम
नए प्रश्न
बीते कुछ दिनों से पुरुषों को कोसने की एक प्रथा सी चल पड़ी है। फेसबुक औऱ इंस्ट्राग्राम पर न जाने कितने किस्से और कहानियों की बाढ़ आई हुई है,जिनमें पुरुषों द्वारा महिलाओं पर होने वाले शोषण के किस्से बाकायदा नमक मिर्च लगाकर सुनाए और लिखे जाते हैं।यह सच है कि आज महिलाओं पर अत्याचार बहुत अधिक बढ़ गया है,साथ ही उसका रूप भी बहुत विकृत हो गया है,लेकिन बीते दिनों घटित हुई कुछ घटनाओं ने ,मेरे मन को झकझोर कर रख दिया,मेरा अन्तस् हिल उठा।
"पुरुष जानवर है" "पुरुष भेड़िया है" यह कहने वाली महिलाओं के सामने ही मैं कुछ प्रश्न उठाना चाहती हूं,जिनका उत्तर शायद उनके पास भी नही है।
महिलाएं कृपया मुझसे नाराज न हों।यह,,लेख मैं मात्र समाधान की चाह में लिख रही हूँ। एक घटना की कड़ियाँ देती हूं--------------
घटना 1
लखनऊ शहर के एक प्रतिष्ठित मार्किट के बाहर एक खूबसूरत सा बुटीक है,उसके बाहर की ओर एक मॉडल की कुछ आदमकद तस्वीरें लगी हैं,,,,,जिनमे वह अंतर्वस्त्रों का विज्ञापन कर रही है। सीढ़ियों पर एक चौदह पन्द्रह वर्ष की बच्ची खड़ी है,जिसका चेहरा कुछ कुछ लज्जा और अपमान से लाल था,,नजरें नीची थीं,,और हम नारी सशक्तिकरण के युग मे खड़े थे।कुछ लोग उस मॉडल को देखकर बेशर्मी से मुस्कुराते हुए उस बच्ची की माप तौल अपनी गन्दी निगाहों से कर रहे थे। बात का यह तर्क देना गलत है कि वे भी पुरुष थे।बात सिर्फ इतनी है कि वह बच्ची वहां पर किसी की प्रतीक्षा कर रही थी और वहाँ खड़ा होना उसकी मजबूरी थी,,,,पर वह बहुत असहज महसूस कर रही थी।
बहुत सी महिलाएं वहाँ से गुजर रही थीं ,,और बहुत सी असहज भी महसूस कर रही थीं लेकिन किसी ने भी कुछ बोलने की जरूरत नही महसूस की।यह किस्सा हर शहर हर मार्केट और हर दुकान का है,मॉडल अंतर्वस्त्रों में मुसकुराती रहती हैं,,और हर रोज सीढ़ियों पर कोई न कोई बच्ची लज्जित होती रहती है,,औऱ समाज मे शोषण का ढोल पीटने वाले लोग बिना कोई प्रतिक्रिया व्यक्त किये आगे बढ़ते चले जाते हैं।
जब एक बार मैंने अंदर जाकर बुटीक की मालकिन से बात की तो उसने व्यंग्य के लहजे में मुस्कुराते हुए कहा "मैडम आज तक तो किसी ने कभी कुछ नही कहा,सिर्फ आपको ही समस्या क्यों है??।"बात बिल्कुल सही थी, कभी किसी ने इस बात का विरोध नही दर्ज किया था।थके निराश कदमों से मैं भी नीचे उतर आई,आज भी दुकानों पर लगे हुए इस प्रकार के चित्र मुझे मेरा मज़ाक उड़ाते हुए से लगते हैं।
कोई घटना होने के बाद मोमबत्ती जलाकर, डीपी बदलकर, सोशल मीडिया पर हल्ला मचाकर ,,और शहर के चौराहों पर खड़े होकर भाषण देना बहुत आसान है,,लेकिन उन्हें रोकने का प्रयास बहुत कठिन है,इसी कठिन कार्य को सम्भव बनाना है।
घटना 2 चौराहे के बीच एक अधेड़ आयु की आंटी जी की किराने की दुकान है,,नीचे का हिस्सा उन्होंने एक प्रसाधन की दुकान को किराये पर दे रखा है,,उसके बाहर भी मॉडल का आदमकद चित्र उसी उत्पाद के विज्ञापन के लिये।जब उनसे कहा तो सामान्य भाव से कहा "अरे छोड़ो बिटिया किस किस से भिड़ें"।
अन्य भी घटनाएं हैं,,जिनमे हम महिलाएं इस लिये कुछ नही बोलती हैं कि"छोड़ो कौन पंगा ले"लेकिन यह गलत है। हमे अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और गन्दी निगाहों के लिये उद्दीपन बनने वाले इन चित्रों और विज्ञापनों को हटाने के लिये एकजुट होना होगा।
यह नए प्रश्न हैं तो उत्तर और समाधान भी नया ही होना चाहिए।
डॉ सुरभि सिंह
मौलिक
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