नीलकंठ से मेरे राम
नीलकंठ से मेरे राम
भगवान राम का चरित्र अपने आप में बहुत ही विशाल है ।यह अनेक अंतरकथाएं एवं अंतर्निहित अभिलाषाएं अपने में समेटे हुए है यदि हम रामायण से लेकर रामचरितमानस तक सभी राम केंद्रित महाकाव्यों का अध्ययन करें तो एक बात स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आती है कि प्रभु राम ने अपने चरित्र से न केवल संपूर्ण विश्व को प्रेरित एवं जागरूक किया है बल्कि अनेक कष्ट और पीड़ाएं सही हैं। यदि बहुत गहराई से देखें तो हमें यह भी ज्ञात होता है अपने अवतारी रूप में ईश्वरीय शक्तियों से युक्त होते हुए भी भगवान राम ने हमेशा अनेक प्रकार की पीड़ाएं सही हैं और एक सामान्य मानव के समान ही जीवन के सुख और दुख का अनुभव किया है।
पुराणों में निहित है कि जब भी कभी कोई महाशक्ति अवतार लेती है तो वह अपनी दिव्य शक्तियों का प्रयोग तब तक नहीं कर सकती है जब तक इसका प्रयोग करना विश्व के संरक्षण एवं विश्व के कल्याण के लिए आवश्यक न हो इसलिए चाहे लक्ष्मण को शक्ति लगने का प्रसंग हो ,चाहे सीता हरण का प्रसंग हो, या राम के जीवन में आने वाली अनेक अन्य बाधाएं और तकलीफें प्रभु राम ने कभी भी अपनी दिव्य शक्तियों का प्रयोग अपने व्यक्तिगत कष्टों के निवारण के लिए नहीं किया। यह अपने आप में एक बहुत बड़ा संदेश है जो हमें यह बताता है कि हम चाहे जितनी बड़ी सत्ता प्राप्त कर लें , हम चाहे जितने शक्तिशाली हों हमें कभी भी अपनी शक्तियों का प्रयोग अपने व्यक्तिगत हितों के लिए नहीं करना चाहिए ।यदि प्रभु राम चाहते तो एक झटके में अपनी सभी समस्याओं का निवारण कर सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया यहां पर मैं भगवान राम के जीवन से जुड़े हुए कुछ प्रसंग और कुछ बातों का उल्लेख करना चाहती हूं जिससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि चाहे वह तुलसीदास जी रहे हों चाहे वह वाल्मीकि रहे हों उन्होंने भगवान राम के चरित्र के द्वारा मानव मात्र को यह सिखाया है कि वह अपने जीवन में यदि अनुशासन और संयम के साथ चलता रहे तो मर्यादा का एक ऐसा विलक्षण उदाहरण प्रस्तुत करेगा कि आने वाली पीढियों में भी याद किया जाएगा ।
प्रारंभ करते हैं इस आलेख के शीर्षक से ,मैंने इसका शीर्षक दिया है “नीलकंठ से मेरे राम “हम सभी जानते हैं कि नीलकंठ भगवान शिव को कहते हैं और इसलिए कहते हैं क्योंकि उन्होंने विषपान किया था । इसके प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया था। उन्होंने प्रतीकात्मक रूप में विष के रूप में संसार की सभी बुराइयों और सभी प्रकार की नकारात्मक वृत्तियों को अपने भीतर रोक लिया था ताकि वह संसार को किसी भी प्रकार का नुकसान न पहुंचाने पाए ।
विष नकारात्मक शक्तियों और तकलीफों का प्रतीक है ।भगवान राम ने अपने जीवन में बहुत तकलीफें सही हैं । उनके बचपन की बात करें तो जब वह छोटे थे तो उन्हें अपने भाइयों के साथ शिक्षा के लिए एक साधारण से बालक के समान वन में जाकर शिक्षा ग्रहण करनी पड़ी । वहां पर उन्होंने बड़े-बड़े राक्षसों का वध किया ।फिर उनका विवाह संपन्न हुआ विवाह भी उनकी पसंद की कन्या के साथ हुआ।
सोचना सरल था कि वह सुखपूर्वक अपना जीवन जिएंगे लेकिन फिर वह घड़ी आ गई जिसमें एक सामान्य व्यक्ति शायद टूट कर बिखर जाता लेकिन वे तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम थे टूटते कैसे! अचानक से यह ज्ञात हुआ कि उन्हें मिलने वाला राज सिंहासन चौदह वर्ष के वनवास में परिवर्तित हो गया है ।
राजतिलक का चौदह वर्ष के वनवास में परिवर्तन होना शायद इतनी बड़ी बात नहीं रही होगी जितना राम के लिए यह स्वीकार करना कठिन रहा होगा कि जिस मां से वह इतना अधिक प्रेम करते थे उस कैकैयी मां ने उनके लिए यह वनवास मांगा ।यह एक ऐसी पीड़ा थी जो न कही जा सकती थी और न किसी प्रकार का क्रोध प्रकट किया जा सकता था। यह बस अंतर्मन को जला सकती थी ।जिसे हम कह सकते हैं प्रबल मानसिक वेदना। राम की मानसिक वेदना यहीं से आरंभ हो गई थी ,फिर वह अपने पिता के निकट गए पिता के दर्द और पीड़ा को महसूस किया ।यह वही पिता थे जो एक ओर अपने वचन से बंधे हुए थे वहीं दूसरी ओर अपने पुत्र के प्रेम में रमें हुए थे लेकिन राम जैसे पुत्र ने उन्हें मुस्कुराते हुए आश्वस्त किया था कि जिस भाव से उन्होंने अपना वचन दिया है उनका पुत्र उसी भाव से उस वचन को पूर्ण करेगा और राम ने चेहरे पर पीड़ा का भाव लाए बिना जंगल का रुख किया।वे वनवास के लिए चल दिए ।
कहना बहुत आसान होता है और कहानी की तरह पढ़ना उससे भी आसान होता है लेकिन यदि हम महसूस करें तो तुरंत एहसास होता है कि एक वह व्यक्ति जिसने अपना पूरा जीवन सुख में व्यतीत किया ,जो एक राजा का पुत्र था ,जो एक राजकुमार था भावी सत्ता जिसके हाथ में आने वाली थी वह व्यक्ति एक झटके में तपस्वियों जैसे वस्त्र में आ जाता है और उसके साथ संपत्ति के नाम पर सिर्फ एक छोटा भाई और पत्नी ही रहते हैं ।
ऐसे राम वन के लिए चल देते हैं लगता है कि शायद वह अब अपने आप को जंगल और आगामी परिस्थितियों में ढाल लेंगे लेकिन सहसा सूचना मिलती है कि उनके पिता नहीं रहे। इधर राम ने वनवास के लिए प्रस्थान किया उधर पिता ने स्वर्ग के लिए ।
वह पिता जिन्हे राम बेहद प्यार करते थे जिनका एक वाक्य राम के लिए पत्थर की लकीर था वह पिता भी उनसे छूट हमेशा के लिए छूट गए।
एक झटके में कुछ ही समय की अवधि में राम ने अपनी मां का बदला हुआ रूप देखा, बदलती हुई सत्ता देखी। पिता की मृत्यु की सूचना से उन्हे कैसी तकलीफ हो रही होगी सहज ही सोचा जा सकता है लेकिन उनके मुंह से उफ भी नहीं निकली। नेत्र से निकलते हुए आंसू सारी वेदना कह रहे थे राम ने वह दर्द भी पी लिया वह तकलीफ भी पी ली।
पूरी रामचरितमानस आप पढ़ लेंगे लेकिन कहीं पर भी राम के क्रोध या आवेश का चित्रण नहीं मिलेगा। बस केवल एक जगह हम उन्हें क्रोधित होते हुए देखते हैं, जब वह समुद्र से प्रार्थना कर रहे होते हैं मार्ग छोड़ने की और समुद्र उन्हें मार्ग नहीं देता है। उस समय प्रभु राम का क्रोध अपने चरम पर था ।तुलसी ने इसका वर्णन कुछ इस रूप में किया है
विनय ना मानति जलधि जड़ ,गए तीन दिन बीत ।
बोले राम सकोप तब ,भयबिनु होही न प्रीत।
लेकिन बस वही एक अवसर था जब वह थोड़ी देर के लिए विचलित हुए थे और उनका दुख क्रोध के रूप में बाहर आ गया था।अब हम वापस उसी स्थिति में चलते हैं और देखते हैं कि राम आगे बढ़ते हैं राम ने उन परिस्थितियों को भी अपना लिया।
पिता का दुख भी अपने दिल में दबा लिया ।छोटी सी कुटिया में पत्नी और भाई के साथ रहने लगे लेकिन यहां भी उनके जीवन को चैन नहीं मिला ।छोटी बड़ी आपत्तियों विपत्तियों को सहते हुए राम के जीवन में सबसे बड़ी तकलीफ उस समय आई जब उनकी जीवन संगिनी सीता उनसे अलग हो गईं। सीता का हरण राम के लिए एक बहुत बड़ी व्यक्तिगत क्षति थी। यह उनके सम्मान का प्रश्न था ,यह उनकी पत्नी के जीवन का प्रश्न था ,यह उनकी पत्नी की अस्मिता का प्रश्न था ,समूची नारी जाति के सम्मान का प्रश्न था ।
बात यह नहीं थी कि सीता ने लक्ष्मण रेखा पार की बात यह थी कि यदि कोई सीता लक्ष्मण रेखा पार भी कर ले तो भी किसी रावण को यह अधिकार नहीं है कि वह उसे हाथ भी लगाए। विभिन्न प्रकार के दुखों को अपने हृदय में दबे हुए राम ने जब अपनी पत्नी के हरण की पीड़ा को अपने हृदय में दबाया तो उनकी अंतरात्मा क्रंदन कर उठी।
यह पंक्तियां मुझे बड़ी दारुण लगती हैं
हे खग मृग हे मधुकर श्रेणी !
तुम देखी सीता मृगनयनी ।
वह संसार को बनाने वाला प्रभु ,वह जिसने संपूर्ण प्राणियों में श्वांस डाली वह ईश्वर जो संपूर्ण विश्व का अधिष्ठाता था ,वह भगवान जो सभी प्राणियों का पोषण करते थे आज वह भगवान कण कण के सामने बिलख बिलख कर रो रहे थे और अपनी पत्नी का पता पूछ रहे थे लेकिन कोई भी उन्हें बताने में सक्षम नहीं था ।
इतना अवश्य था कि प्रभु राम को अपने जीवन में कुछ बेहद अच्छे मित्र मिले जिनमें से हनुमान जी भी थे ।हनुमान जी का मिलना उनके जीवन का एक बेहद सकारात्मक पक्ष था आज भी जब हम किसी व्यक्ति के सहायक या मित्र रूप की बात करते हैं तो
कह उठते हैं कि वह तो उनके हनुमान हैं। हनुमान अर्थात उनके सभी कष्टों का समाधान प्रस्तुत करने वाले वाला व्यक्ति। मंगलेश डबराल की एक कविता है “संगतकार “ उसमें संगतकार का चरित्र पढ़ते समय मुझे हनुमान जी का चरित्र याद आता है ।हनुमान जी ने भगवान राम के जीवन में एक संगतकार की भूमिका अदा की जिन्होंने उनके जीवन की धुन को कभी भी भटकने नहीं दिया। उनके जीवन को कभी भी किसी राग से दूर नहीं जाने दिया ।उनके आत्मबल और उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने का कार्य किया ।
सीता जी के कष्ट को सोचकर राम एक पल के लिए भी चैन से नहीं रहे यदि सीता रावण की अशोक वाटिका में अपने पति की याद में व्यथित थीं तो राम भी उनके उस दुख की कल्पना कर करके तड़प रहे थे ।
यदि हम इस स्थिति की विवेचना करें तो इसके पीछे भी कष्टों की घनिष्ठ श्रृंखला है जो यह बताती है कि कोई व्यक्ति चाहे जितना अपने आप को अपने दुखों से दूर करने का प्रयास करे लेकिन यदि उसके भाग्य में तकलीफ लिखी है तो वह कभी कम नहीं होती है। सीता की मुक्ति के लिए राम ने भरपूर प्रयास किया और एक भयंकर युद्ध की भूमिका रची गई ।हिंदी के जाने-माने कवि निराला जी ने “राम की शक्ति पूजा “लिखकर इस स्थिति की बेहद सुंदर मनोवैज्ञानिक विवेचना प्रस्तुत की है ।
मैं सभी से कहूंगी कि “राम की शक्ति पूजा” अवश्य पढ़ें “राम की शक्ति पूजा” एक पौराणिक कथा को आधार बनाकर वर्तमान परिवेश में लिखी गई बेहद सुंदर रचना है, इसमें दिखाया गया है कि रावण से युद्ध करते-करते राम जब थकने लगते हैं और स्वयं को पराजित अनुभव करने लगते हैं तब एक समय उन्हें भी लगने लगता है कि अन्याय अधर्म और असत्य जीत रहा है और धर्म पराजित हो रहा है ।फिर वे मां शक्ति की उपासना करते हैं और मां शक्ति की उपासना करते-करते जब उपासना के लिए रखा गया अंतिम नीले कमल का पुष्प भी मां उनकी परीक्षा लेने के लिए उठा लेती हैं तो राम टूट जाते हैं ।पूरी तरह से उनकी वेदना उनके व्यक्तित्व पर हावी हो जाती है और लगता है कि अब राम अपने इस उपक्रम में हार गए हैं हालांकि उसी वक्त मां प्रकट होती हैं और उन्हें अजेय शक्ति का वरदान देती हैं।
इस प्रकार रावण को वे पराजित करते हैं। प्रतीकात्मक रूप में देखें तो मां शक्ति राम के ही अंदर की आत्म शक्ति हैं जो उन्हें जीतने के लिए प्रेरित करती है। वर्तमान परिवेश में भी जब भी कभी कोई व्यक्ति हारने लगता है पराजित होने लगता है उस समय उसके ही अंदर समाई हुई शक्ति अचानक से उसे प्रेरित करती है और वह बिना हारे अपने कर्म में लग जाता है ।
राम के जीवन से प्रेरित “राम की शक्ति पूजा” अपने आप में एक बहुत ही प्रेरक रचना है इसके माध्यम से भी हम राम के उसे मनोवैज्ञानिक दुख को समझ सकते हैं कि जब वह निरंतर पराजित हो रहे थे तो उनके मन पर क्या असर पड़ रहा था।
आज भी देखिए यदि कोई व्यक्ति निरंतर पराजित होता रहता है तो वह अपना संयम खो देता है लेकिन वे तो प्रभु राम का अवतारी स्वरूप थे।
राम के जीवन में तकलीफ और वेदना का एक अवसर उस समय आया जब हमेशा परछाईं की तरह साथ-साथ चलने वाला छोटा भाई बेजान शरीर लिए मृत्यु शैय्या पर लेटा हुआ था ।लक्ष्मण के सर को अपनी गोद में लेकर बैठे हुए राम एक सामान्य मानव की तरह विलाप करते हैं और कहते हैं कि वह अयोध्या लौटकर भला क्या जवाब देंगे अपनी उस मां को जिसने अपने लाल को उनके साथ खुशी-खुशी भेज दिया ,वह क्या मुख दिखाएंगे अयोध्या की जनता को ,वह क्या मुंह दिखाएंगे अपने आप को ।राम की वेदना उस समय चरम पर थी लेकिन फिर उसी समय हनुमान जी उनके लिए जीवन का प्रतीक संजीवनी बूटी लेकर हाजिर हो गए और लक्ष्मण के प्राण बच गए ।यहां हम यह भी देखते हैं कि जहां पर भी राम पराजित होने लगते हैं वहीं पर उनकी आत्मशक्ति और उनका मनोबल उनका साथ देने लगता है।
रावण को मारकर राम अपनी पत्नी को पुनः प्राप्त करते हैं ।वह पत्नी जो उनके सुख-दुख की संगिनी थी, वह पत्नी जो उनके आधे अंग की भागी थी, वह पत्नी जो उनकी आत्मा का अंश थी ,वह पत्नी जो उनका पहला और अंतिम प्यार थी ,वह पत्नी जो उनके जीवन के हर कोमलतम एहसास की साक्षी थी ,वह पत्नी सीता उनके पास लौटी और यहीं से वह क्षण उत्पन्न हुआ जिसने केवल उस युग में ही नहीं बल्कि आगे आने वाले समय में भी भगवान राम के चरित्र पर प्रश्न चिन्ह उठाने का कार्य किया लेकिन किसी ने भी उसे घटना को उसे तथ्य को भली प्रकार से समझने का प्रयास नहीं किया ।जब सीता राम के पास लौटीं तो कहा गया कि उन्होंने सीता मां की अग्नि परीक्षा ली ।
यह एक ऐसा प्रसंग है जो घुमा फिराकर प्रस्तुत किया गया है। वस्तुत ऐसा विधान था कि नकारात्मक परिस्थितियों से सात्विक परिस्थितियों में लौटकर आने पर शुद्धिकरण होना चाहिए । हम जब भी कहीं बाहर से आते हैं तो अपने आप का शुद्धिकरण करते हैं । जिस घटना को अग्निपरीक्षा का नाम दिया गया वह वस्तुतः शुद्धिकरण ही था ।मां सीता दैवीय शक्तियों से युक्त थीं इसलिए उन्होंने अग्नि में प्रवेश करके रावण के यहां की सभी नकारात्मकता को त्याग दिया जिसको कालांतर में अग्नि परीक्षा नाम दिया गया।
सीता राम के साथ वापस आ गईं।अयोध्या में राम का रामराज्य आया सुंदर शासन स्थापित हुआ। एक स्वप्नकथा सी कहानी सा लगा सब कुछ कि अब सब कुछ अच्छी तरह संपन्न हो गया है ।
पूरी कथा अब अच्छी तरीके से समाप्त हो गई है लेकिन नहीं यहीं से राम के बीते हुए दुखों ने फिर उनकासाथ पकड़ लिया और उन्हें अपनी पत्नी को वन जाने के लिए कहना पड़ा राम के चरित्र पर लगने वाला यह दूसरा आक्षेप था यह भी पूरी तरह से गलत था क्योंकि इसको भी तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया ।
भगवान राम राजा थे जनता की एक-एक बात को सुनना और उसके भ्रमों का निवारण करना उनके लिए आवश्यक था ।
उस समय आज की तरह का लोकतंत्र नहीं था कि किसी एक मंच पर खड़े होकर अपनी बात कही जा सके इसलिए राजा लोग वेश बदलकर लोगों के बीच में जाते थे और उनकी बात सुनते थे।
उसी समय उन्होंने धोबी की बात सुनी ।वे एक मानव अवतार थे और हर समय दिव्य शक्तियों के साथ नहीं रह सकते थे ।उनके मन में भी यह विचार आया कि उनकी जनता यदि ऐसा सोचती है तो क्यों न अपने व्यक्तिगत सुखों को किनारे रखकर जनता की संतुष्टि की बात सोची जाए। सीता पर उनका पूरा अधिकार था उन्होंने सीता से वन जाने के लिए जरूर कहा लेकिन उस समय उनके कलेजे पर क्या बीती होगी यह सहज ही समझा जा सकता है।
हम मान सकते हैं कि यह उनके व्यक्तित्व का एक ऐसा पक्ष है जिसके ऊपर मानवीय रूप हावी हो गया क्योंकि उन्होंने मानव के रूप में अवतार लिया था तो मनुष्योचित चीजों से अपने आप को दूर कैसे रख सकते? इसी संदर्भ में एक बहुत ही मार्मिक प्रसंग मुझे याद आता है ।मेरी मां अक्सर बताती हैं ।इसका आधार क्या है? यह मैं नहीं जानती लेकिन मां सूर्यवंशी ठाकुर हैं और नाना के यहां ये कथाएं आम कथाएं हैं जिन्हें बच्चे सोते समय सुनते थे सवेरे उठने के बाद सुनते थे।
मां बताती हैं कि जिस समय सीता जी के पुत्र हुए( वहां पर यही प्रचलित है कि मां सीता के लव और कुश नामक जुड़वां पुत्र उत्पन्न हुए थे )तो उन्होंने अयोध्या संदेश भिजवाया । जिस समय एक तपस्वी और एक तपस्विनी यह संदेश लेकर आए उस समय भगवान राम दातून कर रहे थे हाथ में उनके सोने का लोटा था और वे महल के किनारे सरोवर के समीप खड़े थे ।लक्ष्मण भी वहीं थे।
शायद आप लोग भी जानते होंगे कि उस समय संदेश भिजवाने की परंपरा यह थी कि जिस भाषा और लहजे में उसको भेजा गया हो उसी भाषा में उसे पहुंचाया जाए । तो संदेश यह था “ लक्ष्मण यहां वन में तुम्हारे भतीजे जन्मे हैं “यह सुनते ही प्रभु राम की आंखों से झर झर आंसू गिरने लगे और वह सोने का लोटा उनके हाथ से छूटकर सीढ़ियों से होता हुआ सरोवर में विलीन हो गया।
उन्हे दुख इस बात का था कि संदेश होना चाहिए था “ हे प्रभु राम तुम्हारे पुत्र उत्पन्न हुए हैं” लेकिन यहां पर अपनी स्वाभिमानी पत्नी के मुख से यह सुनकर कि “लक्ष्मण तुम्हारे भतीजे हुए हैं” राम ने तुरंत अनुमान लगा लिया कि सीता बेहद आहत हैं पति और पत्नी के बीच जब संबंध बहुत भावुक और प्यारे होते हैं तो उनमें क्रोध नहीं उत्पन्न होता है ।उनमें दुख और तकलीफ उत्पन्न होती है जितना दुख राम यहां सह रहे थे उतना ही दुख जंगल में सीता सह रही थीं ।
राम ने सीता को वन भेजने के बाद एक भी पल चैन और सुकून से नहीं बिताया क्योंकि उन्हें अपनी प्रजा का पालन करना था ।अपने पिता के उस शासन को सुशासन बनाना था इसलिए वे अपने जीवन को पूर्ण रूप से अपने पिता के लिए समर्पित किए हुए थे ।बीच-बीच में बादलों के मध्य चमकने वाली बिजली के समान सीता की स्मृति उनके मन में कौंध सी जाती थी। राम के जीवन में कभी भी किसी दूसरी स्त्री का प्रवेश नहीं हुआ एक पत्नी व्रत धारी राम ने यह प्रण लिया था कि वह कभी भी सीता की जगह किसी और को नहीं देंगे इसीलिए सोने की प्रतिमा यज्ञ के समय सीता के स्थान पर रखी गई थी। वहीं राम जब सीता और अपने पुत्रों को लेने वन को जाते हैं तो सीता से उनका सामना नहीं होता क्योंकि सीता ने आंखें नीचे करके ही वाल्मीकि ऋषि से कहा कि “एक स्त्री के लिए न उसका मायका होता है और न ही पति का घर “
ऐसा उन्होंने इसलिए कहा कि वाल्मीकि ने सीता से कहा था कि “पुत्री तुम अपने पति के साथ जाओ यह मैं तुम्हें कह रहा हूं तुम्हारा मानस पिता होने के नाते।” जंगल में वाल्मीकि के आश्रम में सीता रह रही थीं।
गौर कीजिएगा सीता के पिता भी बहुत बलशाली और बहुत वैभवशाली राजा थे लेकिन सीता वहां भी नहीं गई सीता ने वाल्मीकि को उत्तर दिया कि आपने अगर मुझे आदेश दिया है तो मैं उस आदेश को टालूंगी नहीं ।
यह कहकर सर नीचा किए हुए सीता ने अयोध्या की ओर दस कदम चलकर वाल्मीकि की बात का पालन किया और उसके बाद जब तक राम उन तक पहुंचते उन्होंने धरती से शरण मांग ली ।
यह बेहद मार्मिक तथ्य था सीता जानती थीं कि उनके पुत्रों के लिए अब पिता का संरक्षण आवश्यक है इसलिए अपने पुत्रों को उनके पिता के हाथों में सौंपकर सीता ने संसार त्याग दिया और राम लुटे हुए से अपने पुत्रों को लेकर अयोध्या वापस आ गए ।बाद में दीर्घ सुशासन के बाद जीवन के सभी दुखों को दबाकर प्रभु राम ने अवतारी स्वरूप का त्याग कर दिया।जिस स्थान पर उन्होंने जलसमाधि ली उसे “गुप्तार घाट” कहा गया।
जब मैं इस अंश को पढ़ती हूं तो अनायास ही मेरी आंखें भीग जाती हैं यकीन मानिए जब भी कभी गुप्तार घाट जाती हूं और वहां पर दूर-दूर तक फैले हुए सरयू के जल को देखती हूं तो लगता है जैसे डूबती किरणों के संग जल में कोई एक व्यक्ति अपने तीन भाइयों के साथ प्रवेश कर रहा है और प्रवेश करता चला जा रहा है मुझे लगता है मेरे राम नीलकंठ से रहे हैं जिन्होंने सारा जहर सारा विष अपने भीतर समेट लिया है ।राम !तुम सुन रहे हो ना।
मौलिक
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