प्यार को प्यार ही रहने दो



"दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन ". वैलेंटाइन डे यानी स्नेह दिवस ,मन में मस्ती और मदहोशी छा जाने का दिन ।फरवरी शुरू होते ही मानो माहौल आशिकाना होना शुरू हो जाता है । 
दो दिन पहले छत पर बैठी हुई मैं, धूप का जबरदस्ती आनंद लेने का प्रयास कर रही थी( धूप अब मटर की फलियों  की तरह कड़ी हो गई है)तो अचानक से अपने जमाने का वैलेंटाइन डे याद आया, क्योंकि जब से टीचर बनी हूं, तब से वैलेंटाइन सप्ताह शुरू होते ही हमारे एंटीने, और रडार तेज होने शुरू हो जाते हैं, क्योंकि हमारे बच्चे हाई स्कूल और इंटरमीडिएट के हैं ,यानी कि प्रभावित होने वाली सर्वाधिक महत्वपूर्ण आयु में हैं और यह अनुशासन आवश्यक भी है क्योंकि वैलेंटाइन डे सिर्फ एक दिन  या एक सप्ताह का होता है, लेकिन जीवन और करियर हमेशा रहता है।  इतने वर्षों से तो वैलेंटाइन डे का यही रूटीन रहा है, कि स्कूल में बच्चों पर नजर रखनी है ,उनकी काउंसलिंग करनी है और इसी तनाव में खुद का वैलेंटाइन डे  इतने वर्षों  से, शाम को गुलाब की जगह गोभी के फूल के कोफ्ते पर आकर समाप्त होता है ।                                   
 यह सन पच्चानवे था जब मैं ग्रेजुएशन करने के लिए हरदोई के ही  कोएड कॉलेज में दाखिल हुई थी। जिस कॉलेज में मेरे पिता वरिष्ठ प्रोफेसर हों और लड़के उनके स्टूडेंट हों तो वैलेंटाइन का कचूमर तो पहले ही निकल जाना है ।उस समय वैलेंटाइन डे  नया नया चुपके चुपके प्रचलन  में आया था ।हम सहेलियां गुपचुप बतिया कर खुश हो लेते थे ।उन दिनों अजय देवगन और अक्षय कुमार जैसे हीरो में हमें अपने भावी वैलेंटाइन का चेहरा नजर आता था,लेकिन उससे पहले भैया लोगों का चेहरा घूम जाता था। इस प्रकार दूर-दूर तक कहीं वैलेंटाइन मिलने की संभावना नहीं थी।                                       हरदोई एक प्यारा सा छोटा सा लेकिन बड़ा सजग शहर है ।भैया लोग तो भैया लोग ,उनके मित्रगण भी भाइयों की भूमिका निभाते थे। इसलिए किसी भी सड़क पर पैदल निकल जाने पर चार पांच लोग आकर पूछ ही लेते थे,
"बिटिया अकेले काहे चलो घर छोड़ देते हैं"।                                    ऐसे ही एक बार जब "वैलेंटाइन सप्ताह" चल रहा था तो, कॉलेज से थोड़ा जल्दी निकलना पड़ा क्योंकि इलेक्शन का माहौल था,और कॉलेज में हंगामा मचा था ।   पहली बार अकेले लौट रही थी ,खरामा खरामा वातारण का आनन्द लेती हुई,तब तक पापा के, घनिष्ठ मित्र  और हमारे आदरणीय  "चौहान ताऊ "जी के बेटे राहुल दादा मिले और बड़ी जोर से गरजे, "क्लास  छोड़ कर कहाँ जा रही हो ?"और मैंने दस मिनट तक उन्हें समझाया ,फिर भी उन्होंने मेरे लिए रिक्शा किया और घर तक छोड़ कर गए। उनकी बाइक  खाली नही थी,इसलिये रिक्शे के पीछे पीछे धीरे धीरे चलते हुए आये।मन में ख़्याल आया ' देख ली वेलेंटाइन डे की शोभा'। फिर सोचा कि 'अब जब बाहर पढ़ने जाएंगे , तब सोचेंगे "वेलेंटाइन डे" के बारे में' और प्रभु जी ने हमारी सुन ली ।                  
 महिला डिग्री कॉलेज में बी.एड. में एडमिशन मिला, हॉस्टल एलॉट हुआ ।पढ़ाई में  इतना मगन हो गई कि  भूल गई कि "वेलेंटाइन डे " जैसा भी कुछ होता है। आखिर फिर चौदह फरवरी आ गई ।तब तक यह बीमारी  "महामारी" का रूप ले चुकी थी। हॉस्टल में सभी लड़कियां पार्टी के मूड में थीं । मैं बी.एड. में थी, सीनियर थी इसलिए वार्डन मैंम ने दो दिन पहले ही मुझे जिम्मेदारी दे दी ,कि लड़कियों पर नजर रखो ।लो जी !हो गया कबाड़ा। ऐन  त्यौहार वाले दिन आउटिंग बन्द कर दी गई। ऐसे में मुझे अपनी प्रिय सखियों ,सीमा (सीमा रॉय द्विवेदी , प्रसिद्ध लेखिका)और सपना की याद आई ।सीमा तो खैर मेरी समवयस्क  संरक्षक   ही थी, सपना भी  सीधी-सादी थी। मैंने सीमा से मायूसी भरे स्वर में कहा "यार कल वैलेंटाइन डे है 'कम से कम थोड़ा अमीनाबाद ही घुमा दो "  पर उसने हड़का   दिया" चुप कर !यहां पढ़ने आई है कि घूमने। और मैं चुप हो गई। "वैलेंटाइन" का तो खैर दूर-दूर तक पता नहीं था, लेकिन थोड़ा बाजार की चहल-पहल देखनी थी ,वह उम्मीद भी खत्म हो गई ।                          
सभी जूनियर  मौज में थीं, सबको पता था कि बाहर नहीं जाना है ।टीवी रूम में बैठी सब  टीवी देख रही थीं। बढ़िया नाश्ता बना था। सारी बुलबुलों को कैद करके, हॉस्टल शांत था। मैं भी नहा कर ,बाल धोकर हॉस्टल की तीसरी मंजिल की बड़ी सी छत पर आकर धूप में लेट गई ।कुछ लड़कियाँ यहाँ धूप में बैठी  थीं।  मैं सोच रही थी कि 'अब तो वैलेंटाइन मिलने से रहा, शादी होगी तो पति जी को ही वैलेंटाइन समझ लेंगे' तभी कानों में जवाहर भैया की तेज आवाज  पड़ी, हॉस्टल की दीवारों से घूमती हुई" सुरभी बिटिया ! तुम्हारी कॉल लगी है।" यह हॉस्टल की तकनीकी भाषा  थी।जब भी  कोई विज़िटर मिलने आता था ,तो जवाहर भैया (गॉर्ड) ऐसे ही चिल्लाते थे।मुझे पता लगा कि पापा आए हैं ,पापा के साथ घूमना फिरना मुझे शुरू से ही बहुत अच्छा लगता था ।बस झट  से वार्डन मैम से आउटिंग पास लिया (हालांकि इसके लिए उनसे थोड़ी तुर्र पुर्र  भी हो गई )और  फिर ,  निकल लिए पापा के साथ ।                            
  हवाओं में शोखियां घुली हुई थीं। बहुत अच्छा लग रहा था और पापा साथ  थे तो आत्म विश्वास भी था ।पापा यूँ ही कुछ देर टहलते रहे फिर हम लोग पापा के मित्र,जो लखनऊ विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग की प्रोफेसर थे (डॉ योगेंद्र प्रताप सिंह ) के घर गए ।उनकी पत्नी  बहुत अच्छी  थीं, उनसे मिली।उन दोनों के बारे में मैं पहले  से ही   जानती थी ,और उन्हें चाचा ,चाची कहती थी ।
वहां उनके नन्हे नन्हे बच्चों से मिली, उनकी बड़ी बहन के  बेटे बबलू भैया से भी मुलाकात हुई ।सभी बैठे नाश्ता कर रहे थे ,तभी एक स्मार्ट सा लड़का प्रकट हुआ ,जिसकी कमर में, पेजर (उस समय का फैशन आइकन )था और हाथ में नोकिया का फोन ,(उस समय यह फोन इतना भारी होता था कि यदि फेंक कर मारा जाए, तो आदमी का सिर टूट जाए) लड़का वैसे तो बहुत अच्छा था ,लेकिन एक्टिव कुछ अधिक था। पता चला कि वह जनाब चाची जी के सगे भतीजे थे,और लड़कियों का इतना सम्मान करते थे कि ड्राइंग रूम में सब के साथ-साथ बड़े आदर भाव से मेरे पैर भी छू लिए  । "वैलेंटाइन डे "पर एक अजनबी ,स्मार्ट लड़का किसी लड़की के पैर छू ले यह नितांत विचित्र बात लगी मुझे।बातचीत होती रही,सभी बतिया रहे थे, मैंने भी सामान्य वार्तालाप में पूछ लिया "भैया आप हरदोई कब आएंगे ?"तो उत्तर मिला" तुम्हारी शादी में"  शायद मां सरस्वती उस दिन पूरा राशन पानी लेकर वहां विराजमान थीं और कभी किसी की जुबान पर,तो  कभी किसी की जुबान पर बारी बारी से बैठ रही थीं। फिलहाल तो लड़के की जुबान पर बैठी थीं।                                   
पापा ने मुझे हॉस्टल छोड़ा और बात आई गई हो गई।  लगभग एक वर्ष बाद फिर फरवरी शुरू हुई । अब तक  "वैलेंटाइन डे" के विषय में सोचना छोड़ दिया था  वैसे भी उस जमाने में लड़कों को न पढ़ने पर  'भैंस की डेयरी 'खोलने की धमकी दी जाती थी,और लड़कियों को शादी की । चूंकि मेरे अंक अच्छे आ रहे थे तो शादी का  दूर दूर तक कोई प्रश्न ही नही था और मेरी मां को एक ही धुन सवार थी कि " जब रिश्ता खुद चलकर आएगा तब तुम्हारी शादी करेंगे  "और मैं मन ही मन हंसती ' कि आपकी  बेटी में कौन से लाल लगे हैं, जो रिश्ता चलकर  आएगा, लेकिन मां सरस्वती मां की जुबान पर भी बैठ चुकी थीं इसीलिए एक दिन उन्ही चाची जी (अब बुआ) का फोन आया कि "बेटा !हम तुम्हे अपने घर लाना चाहते हैं)   मैं इस अप्रत्याशित बात से घबरा गई और आगे की बात मां ,पापा और भैया लोगों ने संभाली। मेरे पापा मुझे बेटी से अधिक मित्र मानते थे ,बहुत खुलकर बात करते थे। वह मेरे कमरे में शाम को चलकर आए ,और उन्होंने स्पष्ट पूछा "तुम्हे  यह लड़का पसंद है।"  मैंने दिमाग के घोड़े दौड़ाये , चाची जी के उस भतीजे से ,बस आधे घंटे की मुलाकात थी और कोई भाव नहीं पनपा था क्योंकि वह चरण स्पर्श कर चुके थे और मैं भैया बोल चुकी थी ,फिर संस्कारों के बंधन तो थे ही ,इसलिये समझ में नही आया कि क्या कहूँ?  पर पापा ने जब दूसरी बार पूछा, तो मुंह से निकला" पता नहीं"
इसे मेरी स्वीकृति मान लिया गया  ।     घर में मेरी शादी की हवा बह रही थी, और वातावरण में वैलेंटाइन डे की ।अभी भी प्यार जैसा कुछ नहीं जन्मा था ।पापा पसोपेश में थे  ,कि  इकलौती लड़की की शादी  और लड़का प्राइवेट जॉब में लेकिन लड़के का ,अपनी मां के स्वास्थ्य के प्रति अधिक सजग रहना उन्हें आश्वस्त कर रहा था कि जो अपनी मां के प्रति इतना चिंतित है वह कल को मेरी बेटी की भी चिंता करेगा। मेरी एक फोटो ढूंढी जाने लगी, लड़के के परिवार वालों के लिए क्योंकि मुझे सिर्फ लड़के की बुआ और उस लड़के ने ही देखा था इसलिए उसके घर वालों के पास तस्वीर भेजी जानी थी ।वैसे तो अजब गजब मुद्राओं वाली बहुत सी फोटुएं थीं,लेकिन ब्याह के लिए   भेजी जाने वाली ,कोई फोटो नहीं थी क्योंकि कभी सोचा ही नहीं था इस बारे में। किसी तरह हॉस्टल की बेंच पर बैठी हुई एक फोटो भेज दी गई ।  जमाना बदल रहा था और होने वाली बहू की  फोटो लोग स्वाभाविक ही चाहते थे,इसलिये वही भेज दी गई। इस  सबके बीच एक ऐसी बात हुई जिसने मेरे पापा का मानसिक द्वंद्व   एक झटके में खत्म कर दिया ।वे चाहते थे कि लड़का  एक बार आकर मुझे पुनः देख ले बातचीत कर ले ,इसलिए उन्होंने फोन किया और आने का आमंत्रण दिया ,पर उधर से जो उत्तर मिला उसे सुनकर पूरा घर दिल हार बैठा "अंकल लड़कीं कोई  शोपीस  नहीं है,जो मैं देखने आऊँ, यदि उसे कोई आपत्ति न हो तो आप बुआ के पास आकर डेट फाइनल कर लीजिए।" और फिर ग्यारह फरवरी वरीक्षा तथा अट्ठारह  फरवरी को गोद भराई की रस्म संपन्न हो गई। इस प्रकार चौदह फरवरी तक मेरे लिए वैलेंटाइन तय कर दिया गया था और लगभग महीने भर के अंदर  ग्यारह मार्च को मेरा ब्याह हो गया। हालांकि जयमाल की रस्म होते ही उनके घरवाले जोर जोर से चिल्लाकर चिढ़ाने लगे" पैर छू ले,,पैर छू ले"
"लड़कीं कोई  शोपीस नहीं है" यह वाक्य मेरे लिये "आई लव यू" से हजार गुने बढ़कर है,क्योंकि प्यार से भी ऊपर सम्मान होता है। इन्होंने अपना वादा पूरा किया,मेरी शादी में आये, लेकिन मुझे लेने।                           
मैं बस इतना ही कहना चाहती हूं कि आज के इस बाजारीकरण के युग में ,अंधानुकरण के चक्कर में पड़ कर अपनी जिंदगी के सच्चे प्यार को न भूलें। प्यार के लिए किसी भी वैलेंटाइन डे की आवश्यकता नहीं होती है, प्यार और सम्मान के साथ दिखने वाला हर दिन वैलेंटाइन डे होता है। जरूरी नही है कि कोई हमें चॉकलेट या टेडी ही गिफ़्ट में दे, अपनी "वर्किंग वाइफ" की स्कूटी निकालकर स्टार्ट कर देना,या चाय की केतली थमा देना भी प्यार है,जरूरी नही है कि "आई लव यू"ही बोला जाए ,"अपना ख़्याल रखना "भी कम महत्वपूर्ण वाक्य नही है। जिनके जीवन में यह  फिल्मी "वेलेंटाइन डे"  है ,वे खुश रहें,और यदि नही है तो हर लम्हे में मोहब्बत तलाशें,मिलेगी जरूर। 
डॉ सुरभि सिंह

(मौलिक)

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